1881 में उन्होंने बंगलोरे के सेंट्रल कॉलेज से बी.ए. पूर्ण किया। उसके पश्चात सरकार की सहायता से पुणे कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग को ज्वाइन किया। 1884 में स्नातक पूर्ण करने के पश्चात उन्होंने मुंबई के PWD में सहायक अभियंता के पद को ज्वाइन किया। उसके पश्चात उन्होंने भारतीय सिचाई आयोग भी ज्वाइन किया। 1985 में सुक्कुर के म्युनिसिपल वाटरवर्क्स में कार्य करते हुए उन्होंने ब्लॉक सिस्टम को बनाया जिससे डैम से निकलने वाली बेकार पानी को उपयोग में लाया जा सके। उनके दिन प्रतिदिन किये गए उच्च गुणवत्ता के कार्य से प्रसन्न हो कर सरकार ने उन्हें 1906 -1907 में वाटर सप्लाई और ड्रेनेज सिस्टम के अध्यन के लिए Aden भेजा गया।
1909 में उन्हें मैसूर राज्य में मुख्या अभियंता का पद दिया गया। और 1912 में मैसूर का दीवान घोषित किया गया।
श्री एम् विश्वैश्वराया ने ही 1917 में बंगलोरे में सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना की जो की अब विश्वैश्वराया कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग के नाम से जाना जाता है।
सन 1924 में उन्होंने कर्नाटका स्थित मैसूर के निकट मांड्या जिले के कावेरी नदी के ऊपर कृष्न राजा सागर डैम का निर्माण करवाया जिसमें उनका अतुलनीय योगदान रहा है।
102 वर्ष की आयु में 14 अप्रैल सन 1962 में उनका देहांत हो गया। परन्तु इन 102 वर्ष के समय में उनके द्वारा किये गए महान और अतुलनीय कार्य के लिए उन्हें अनेको प्रतिष्ठित पुरष्कारो से उनका सम्मान किया गया। 1915 में ब्रिटिशर्ष द्वारा उन्हें उनके महानतम सामाजिक कार्य के लिए “कमांडर ऑफ़ दि आर्डर ऑफ़ इंडियन एम्पायर “ से नवाजा गया। 1955 में उन्हें इंजीनियरिंग और शिक्षा में उनके महानतम योगदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित पुरष्कार “भारत रत्न “ दिया गया। उन्हें 8 भारीय विश्वविद्यालयों से बहुत से डॉक्टरेट की डिग्री दी गयी हैं।
भारतीय इतिहास में उनके इन महानतम योगदान के लिए ही आज यानी की 15 सितम्बर को हम इंजीनियरस डे(अभियंता दिवस ) के रूप में मानते हैं।

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